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शुक्रवार, 11 मई 2018

जानिए क्या है वायरल सच: क्या किसी हाईकोर्ट ने गर्मी की छुट्टी में स्कूल फीस पर पाबंदी का फैसला सुनाया है?

अचानक बच्चों की स्कूल फीस को लेकर एक मैसेज वॉट्सऐप पर वायरल हो रहा है. मैसेज में गर्मी की छुट्टियों में स्कूल की फीस पर हाईकोर्ट के पाबंदी लगाने का दावा किया जा रहा है. ये मैसेज देखकर वो माता-पिता ज्यादा परेशान हैं जो जुलाई तक की फीस जमा कर चुके हैं और सोच रहे हैं कि अगर वाकई ऐसा हुआ है तो क्या उन्हें जमा किए पैसे वापस मिलेंगे?
अचानक बच्चों की स्कूल फीस को लेकर एक मैसेज वॉट्सऐप पर वायरल हो रहा है. मैसेज में गर्मी की छुट्टियों में स्कूल की फीस पर हाईकोर्ट के पाबंदी लगाने का दावा किया जा रहा है. ये मैसेज देखकर वो माता-पिता ज्यादा परेशान हैं जो जुलाई तक की फीस जमा कर चुके हैं और सोच रहे हैं कि अगर वाकई ऐसा हुआ है तो क्या उन्हें जमा किए पैसे वापस मिलेंगे?
मैसेज में हाइकोर्ट का ऑर्डर एक पिटीशन नंबर के साथ लिखा हुआ है. पिटीशन नंबर ‘5812 of 2015’ है. पिटीशन नंबर 5812 को जब इंटरनेट पर सर्च किया गया तो पता चला कि ये फैसला पाकिस्तान के सिंध हाईकोर्ट का है. इसी फैसले में सबसे ऊपर याचिकाकर्ता के वकील कमाल अफजर का नाम लिखा हुआ था.
पाकिस्तान में वकील कमाल अफजर ने बताया, ‘’पाकिस्तान के सिंध हाईकोर्ट ने पांच मार्च 2018 को एक फैसला दिया है. ये फैसला प्राइवेट स्कूलों के पक्ष में है. स्कूलों की फीस पर एक सीमा तय होनी चाहिए, लेकिन हाईकोर्ट ने स्कूल की फीस पर कैप लगाने से मना कर दिया था.’’

पाकिस्तान में स्कूलों की गर्मी की छुट्टियां जून जुलाई महीने में होती है, लेकिन कोर्ट ने पूरे फैसले में कहीं भी गर्मी की छुट्टियों में फीस पर पाबंदी लगाने की बात नहीं की है. मतलब ना तो हिंदुस्तान में ऐसा हुआ है और ना ही पाकिस्तान में हाईकोर्ट ने गर्मी की छुट्टियों में स्कूल फीस पर पाबंदी की बात की थी.
पड़ताल में गर्मी की छुट्टी में स्कूल फीस पर हाईकोर्ट की पाबंदी का दावा झूठा साबित हुआ है.

सोमवार, 7 मई 2018

अगर आपको लगता है कि आप ही सब कर रहे तो जरूर पढ़ें

कौन चलाता है
तुम माँ के पेट में थे नौ महीने तक, कोई दुकान तो चलाते नहीं थे,
फिर भी जिए।
हाथ—पैर भी न थे कि भोजन कर लो,
फिर भी जिए।
श्वास लेने का भी
उपाय न था,
फिर भी जिए।
नौ महीने माँ के पेट में तुम थे,
कैसे जिए?
तुम्हारी मर्जी क्या थी?
किसकी मर्जी से जिए?
फिर माँ के गर्भ से जन्म हुआ, जन्मते ही, जन्म के पहले ही माँ के स्तनों में दूध भर आया,
किसकी मर्जी से?
अभी दूध को पीनेवाला
आने ही वाला है कि
दूध तैयार है,
किसकी मर्जी से?
गर्भ से बाहर होते ही
तुमने कभी इसके पहले
साँस नहीं ली थी माँ के पेट में
तो माँ की साँस से ही
काम चलता था—
लेकिन जैसे ही तुम्हें
माँ से बाहर होने का
अवसर आया,
तत्क्षण तुमने साँस ली,
किसने सिखाया?
पहले कभी साँस ली नहीं थी,
किसी पाठशाला में गए नहीं थे,
किसने सिखाया कैसे साँस लो?
किसकी मर्जी से?
फिर कौन पचाता है तुम्हारे दूध को
जो तुम पीते हो,
और तुम्हारे भोजन को?
कौन उसे हड्डी—मांस—मज्जा में बदलता है?
किसने तुम्हें जीवन की
सारी प्रक्रियाएँ दी हैं?
कौन जब तुम थक जाते हो
तुम्हें सुला देता है?
और कौन जब तुम्हारी
नींद पूरी हो जाती है
तुम्हें उठा देता है?
कौन चलाता है इन चाँद—सूर्यों को?
कौन इन वृक्षों को हरा रखता है?
कौन खिलाता है फूल
अनंत—अनंत रंगों के
और गंधों के?
इतने विराट का आयोजन
जिस स्रोत से चल रहा है,
एक तुम्हारी छोटी—सी जिंदगी
उसके सहारे न चल सकेगी?
थोड़ा सोचो,
थोड़ा ध्यान करो।
अगर इस विराट के आयोजन को
तुम चलते हुए देख रहे हो,
कहीं तो कोई व्यवधान नहीं है,
सब सुंदर चल रहा है,
सुंदरतम चल रहा है;
सब बेझिझक चल रहा है।
तुम छोटे से अंश हो इस जगत के,
तुम्हें यह भ्रांति कब से आ गयी कि
मुझे स्वयं को अलग से चलाना पड़ेगा?
मुझे अपना जिम्मा
अपने ऊपर लेना पड़ेगा?
इसी भ्रांति में तुमने
अपने जीवन के सारे कष्ट,
असफलताएँ और
विषाद पैदा कर लिए हैं।

आजादी के पहले से लेकर अब तक नही बदले रायबरेली के किसानो के हालात


आजादी के पहले रायबरेली के किसानो को अग्रेंजो ने और यहाँ के
तालुकेदारों ने  जम कर लूटा और उन पर जुर्म किये उनसे अनेक प्रकार के टैक्स और लगान वसूला जाता रहा है जो की अंग्रेज अपने शासन के खर्चो और तालुकेदार अपनी विलासिला पर खर्च करते थे इन सब जुर्मो से रायबरेली का किसान परेशान होकर अंगेजी शासन के खिलाफ़ उग्र हो गये और आजादी की लड़ाई में  बड़ा आन्दोलन खड़ा कर चुके थे जिसमे रायबरेली के समीप सई नदी के तट पर हुए किसान गोली कांड को जलियांवाला बाग हत्या कांड के बाद आजादी की लड़ाई के इतिहास का दूसरा सबसे बड़ा हत्याकांड माना जाता है रायबरेली के इस आन्दोलन के बारे में रायबरेली जिले के साहित्यकार अमर बहादुर सिंह अमरेश ने अपनी लेखनी से इस का वर्णन इस प्रकार किया है उन्होंने लिखा  रायबरेली के किसानों की भावनाओं का परिचय कुछ तथाकथित किसान नेताओं को मिल चुका था। वे इसे संगठनात्मक रूप देने के लिए आगे बढ़े। ‘अवध किसान सभा’ नामक एक संस्था की भी स्थापना की। इस किसान सभा की नियमावली बनायी गई थी। अवध के किसान-आंदोलन के साथ भारतीय इतिहासकारों ने न्याय नहीं किया है। यदि पं. जवाहरलाल नेहरू इसका उल्लेख ‘मेरी कहानी’ में न करते, तो आज इस आंदोलन का कोई नाम भी न लेता। सन १८५७ के प्रथम स्वाधीनता-संग्राम में अवध के किसानों ने खुलकर फिरंगी सेना का सामना किया था। बाद में सरकार और किसानों के मध्य तालुकेदारों की कड़ी थी। दोनों मिलकर किसानों को दबाने लगे। तालुकेदारों की नीति का पालन उनके अहलकार-मैनेजर, मुख्तार, जिलेदार तथा सिपाही करते थे। वे लगान वसूल करते थे। तालुकेदार अपनी विलासिता तथा उपभोग की वस्तुएँ खरीदने के लिए भी चंदा लगाया करते थे। जैसे हाथी खरीदने के लिए- ‘हाथीवान टैक्स लगता था।

यह थी, अवध और रायबरेली जिले कि किसानों की दुर्दशा। जिले के वयोवृद्ध कांग्रेसी नेता मुंशी सत्यनारायण श्रीवास्तव ने लिखा है- ‘‘बेदखली की तलवार यहाँ के किसानों की गर्दन पर हर वक्त लटकती रहती थी। अवध का किसान तालुकेदारों के जुल्मों से आजिज आ गया था। रायबरेली जिले में जगह-जगह किसानों ने तालुकेदारों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था। बदमाशों को मौका मिला और किसानों को गुमराह कराकर फुरसतगंज, करहिया बाजार आदि स्थानों पर लूट करा दी।’’

सन १९२०-२१ के ऐतिहासिक किसान-आंदोलन का उल्लेख करते हुए पं. अंजनीकुमार ने लिखा है- ‘‘इस आंदोलन का आरंभ क्यों और कैसे हुआ, इसको बताने के लिए यह आवश्यक है कि पहले यह बता दिया जाए कि सन १९२० व उसके पहले यहाँ के किसानों की स्थिति व दशा कैसी थी। तालुकेदारी प्रथा थी। तालुकेदार अपने को राजा कहते थे।’’
आजादी के 70 साल बीत जाने के बाद भी नही बदले है किसानो के हालात पहले अंग्रेज और तालुकेदार की जगह पर व्यपारी और सरकारी अधिकारियो ने ले ली है जिस तरह सेअंग्रेजो के  जुल्मो से तब का किसान परेशान था वर्तमान में अधिकारियों की स्वेच्छाचारिता की वजह से किसान परेशान है 

किसानो के लिए बनाई गयी मंडियों में आज निम्न परेशानिया है जिससे किसान रोज रु बरु होता है
1. व्यापारियों द्वारा किसानों से गेहूं खरीदते समय एमएसपी से ₹200 कम भुगतान किया जा रहा है।
2. किसानों को प्रपत्र 6R न देकर कच्चा पर्चा दिया जा रहा है, जिससे राजस्व की चोरी भी हो रही है।
3. किसानों से गेहूं क्रय करते समय 200 ग्राम की बोरी का वजन 500 ग्राम तथा 700 ग्राम की बोरी का वजन 1500 ग्राम के हिसाब से तय करके कटौती की जा रही है।
4. इसी तरह किसानों से पल्लेदारी की तय राशि से दोगुना भुगतान लिया जा रहा है।
5. सरकारी क्रय केंद्रों पर गेहूँ की बिक्री करने के लिए किसानों को 15 दिन बाद तक का समय दिया जा रहा है।
6. सरकारी क्रय केंद्रों पर दैनिक क्षमता से 3 से 4 गुना अधिक खरीददारी दिखाई जा रही है, केंद्र के अधिकारियों तथा बिचौलियों की मिलीभगत साफ जाहिर होती है।
7. मंडी के नीलामी चबूतरों पर व्यापारियों का अनधिकृत कब्जा है, जिस कारण किसान अपने उत्पाद खुले में रखने के लिए बाध्य हैं। 

जबकि सरकारे आती है सरकारे चली जाती हैसारी सरकारे किसानो का हमदर्द होने का दावाकरती है कुछ दिन पहले जायस जनपद अमेठी जहाँ पर किसान अब्दुल सत्तार पुत्र मोहम्मद उमर पूरे धींगई मजरे खैरहना थाना फुरसत गंज जनपद अमेठी अपनी गेंहू की फसल बेचने आया था । परन्तु तीन दिनों से उसके फसल की खरीद मंडी के द्वारा नही की गई जिसके कारण किसान तीन दिनों से मंडी में ही रुका रहा ।और बीती रात किसान की मौत हो गयी । एक तरफ सरकार गेहूं ख़रीद के आंकड़े जारी कर अपनी पीठ थप थपा रही ही दूसरी तरफ जमीन पर गेंहू खरीद में लगे कर्मचारी अपनी मनमानी से बाज नही आ रहे ।किसानों को कभी बोरा न होने का रोना रोते कभी लेबर न होने का किसानों को महीनों भर बाद का टोकन दे देते है ।
पिछले महीने की 24 तारीख को इसी मंडी में व्याप्त भरस्टाचार को लेकर जय किसान आंदोलन उत्तर प्रदेश के संयोजक संजय कुमार के द्वारा MSP सत्याग्रह किया गया था जिसमे देश भर में किसानों का आंदोलन चला रहे प्रो योगेंद्र यादव भी शामिल हुए । जिसमें किसानों के लिए बने विश्राम गृह पर मंडी समिति के अध्यक्ष द्वारा दसको से जमाये कब्जे को खाली कराने की मांग प्रमुखता से की गई थी ।

शुक्रवार, 4 मई 2018

रायबरेली के गौरव 'श्रीरामचरितमानस' के अद्भुत टीकाकार थे शाहमऊ विकास खण्ड तिलोई जनपद अमेठी के महाराज कुमार बाबू रणबहादुर सिंह

'श्रीरामचरितमानस' के अद्भुत टीकाकार थे शाहमऊ विकास खण्ड तिलोई जनपद अमेठी के महाराज कुमार बाबू रणबहादुर सिंह

भारतीय राजवंश का विद्यानुराग जगत्प्रसिद्ध है। भारत के विद्या-व्यसनी नरेशों ने साहित्य-संगीत और कला को केवल संरक्षित ही नहीं किया, अपितु पूरी निष्ठा के साथ स्वयं भी सृजनधर्म का पालन किया। रायबरेली ज़िले के शाहमऊ-टेकारी के प्रतिष्ठित ताल्लुक़ेदार बाबू गंगाबख़्श सिंह के अनुज महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह ऐसे ही सृजनधर्मी चेतना के आलोकपुंज थे। महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह शाहमऊ-टेकारी के गौरव थे। शाहमऊ-टेकारी का इतिहास तिलोई रियासत से सम्पृक्त है। तिलोई-नरेश वीरशिरोमणि राजा बलभद्र सिंह के निःसन्तान शहीद हो जाने के पश्चात् उनकी प्रथम रानी केश कुँवरि ने शाहमऊ के छत्रधारी सिंह को मुकुट पहनाकर अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। राजा छत्रधारी सिंह के तृतीय पुत्र बाबू जंगबहादुर सिंह को भगीरथपुर का ताल्लुक़ा मिला। सन् 1762 ई. में जन्में बाबू जंगबहादुर सिंह कट्टर हिन्दू ही नहीं, हिन्दी-संस्कृत के पक्षधर भी थे। अपने राज्यकार्य में अरबी और फ़ारसी भाषा का बिलकुल प्रयोग नहीं करते थे। अरबी-फ़ारसी के शब्दों का अपने मुख से उच्चारण भी नहीं करते थे। कालान्तर में हिन्दुत्व का ध्वज फहरानेवाले बाबू जंगबहादुर सिंह को सरकारी मालगुजारी जमा न करने का आरोप लगाकर फ़ैज़ाबाद की तत्कालीन बेगम के द्वारा क़ैद करा लिया गया। बेगम ने बाबू जंगबहादुर सिंह को केवल क़ैद ही नहीं करवाया, अपितु उनके ज्येष्ठ पुत्र बाबू विन्ध्यासेवक सिंह का सिर कटवा लिया। इतिहासकार श्री पवन बख़्शी लिखते हैं- 'जब वह सिर बेगम के सामने पेश किया गया तो बेगम ने आज्ञा देते हुए कहा कि इस सिर को ले जाओ और जंगबहादुर सिंह से पूछो कि यह किसका सिर है। हार्दिक दुःख पहुँचाने की पराकाष्ठा थी। जंगबहादुर सिंह को उनके पुत्र का कटा हुआ सिर दिखाकर उनसे पूछा गया कि यह किसका सिर है? जंगबहादुर सिंह ने सिर को पहचान कर स्वाभिमान के साथ कहा- 'किसी वीर पुरुष का सिर होगा। उन्होंने यह भी कहा कि हमारे वंश के एक वीर पुरुष राजा बलभद्र सिंह थे, जिन्होंने अपना सिर दे दिया था और यह दूसरा वीर पुरुष है, जिसने अपना सिर दे दिया। इसकी वीरता के लक्षण मुझे अब भी इसके मुस्कराते चेहरे पर दिख रहे हैं। धन्य है क्षत्रिय की वीरता! धन्य है उसकी सहनशक्ति! धन्य है उसका उत्साह!' यह उत्तर सुनते ही सब लोग दंग रह गये। जंगबहादुर सिंह की निर्भीकता देखकर बेगम ने यही निश्चय किया कि इन्हें कारागार में ही डाल देना चाहिए।'[1]
बाबू जंगबहादुर सिंह दस वर्ष तक कारागार में रहे। कालान्तर में उनके द्वितीय पुत्र बाबू रघुनाथ सिंह के चतुर्दश वर्षीय पुत्र बाबू सर्वजीत सिंह ने अपने पितामह को क़ैद से मुक्त कराने की पहल की। बेगम ने बाबू सर्वजीत सिंह को क़ैद कर लिया और बाबू जंगबहादुर सिंह को मुक्त कर दिया। बाबू जंगबहादुर सिंह ने शीघ्र ही रुपयों का प्रबन्ध करके मालगुजारी अदा की और अपने चतुर्दश वर्षीय पौत्र बाबू सर्वजीत सिंह को छुड़ाया। मालगुजारी न जमा करने के कारण जो रियासत छिन गयी थी, वह भी वापस हो गयी। ताल्लुक़े की सनद बाबू सर्वजीत सिंह को मिली और ये अवैतनिक मजिस्ट्रेट भी बनाये गये। बाबू सर्वजीत सिंह ने सन् 1857 ई. में आंग्ल-शासकों की बड़ी मदद की थी। इसलिए भगीरथपुर ताल्लुक़े की खूब वृद्धि हुई। अनेक ज़ब्त हुए ताल्लुक़े इसमें मिला दिये गये। शीघ्र ही यह ताल्लुक़ा शाहमऊ-टेकारी के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
बाबू सर्वजीत सिंह के ज्येष्ठ पुत्र बाबू गंगाबख़्श सिंह का जन्म सन् 1853 ई. में एवं कनिष्ठ पुत्र बाबू रणबहादुर सिंह का जन्म सन् 1858 ई. में हुआ। बाबू गंगाबख़्श सिंह सन् 1888 ई. में शाहमऊ-टेकारी की गद्दी पर आरूढ़ हुए। बाबू रणबहादुर सिंह को 'बेरारा' नामक गाँव गुजारे में दिया गया। बाबू रणबहादुर सिंह को कोई सन्तान न थी। साहित्य-सृजन ही उनका मुख्य ध्येय था। 'कनपुरिया क्षत्रिय वंश' (इतिहास) और 'श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासकृत रामायण' की टीका बाबू रणबहादुर सिंह की सारस्वत-साधना के स्थायी स्मारक हैं। महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह ने गोस्वामी तुलसीदास जी की 'नानापुराणनिगमागमसम्मत' उक्ति का परीक्षण करने के लिए बड़े कठिन अध्यवसाय से इस टीका का प्रणयन किया है। महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह कृत 'श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासकृत रामायण की नानापुराणनिगमागमसम्मता टीका' के प्रत्येक काण्ड पृथक् पृथक् प्रकाशित हुए हैं। सर्वप्रथम 'सुन्दरकाण्ड' का प्रकाशन विजय दशमी विक्रमाब्द 1979 (1922 ई.) को हुआ। इसी क्रम में विक्रमाब्द 1979 (1922 ई.) में ही 'अरण्यकाण्ड' और 'किष्किन्धाकाण्ड' का प्रकाशन हुआ। तीन वर्ष के बाद चैत्र शुक्ल दुर्गाष्टमी विक्रमाब्द 1982 (1925 ई.) को 'अवधकाण्ड' प्रकाशित हुआ। 'अवधकाण्ड' प्रकाशित होने के पाँच वर्ष बाद मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी विक्रमाब्द 1987 (1930 ई.) को 'बालकाण्ड' और 'लंकाकाण्ड' प्रकाशित हुए। अन्त में चैत्र शुक्ल रामनवमी विक्रमाब्द 1988 (1931 ई.) को 'उत्तरकाण्ड' का प्रकाशन हुआ। महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह ने शाहमऊ-टेकारी रियासत से गुजारे में प्राप्त सीमित संसाधन से इस कार्य को अत्यन्त निष्ठापूर्वक पूर्ण किया है। डबल डिमाई साइज़ में बालकाण्ड 432 पृष्ठ में, अवधकाण्ड 348 पृष्ठ में, अरण्यकाण्ड 96 पृष्ठ में, किष्किन्धाकाण्ड 62 पृष्ठ में, लंकाकाण्ड 192 पृष्ठ में और उत्तरकाण्ड 182 पृष्ठ में मुद्रित है। इस टीका की रचना के उद्देश्य का उद्घाटन करते हुए महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह लिखते हैं- 'मैंने अनेक पुराणादि धर्मग्रन्थों में यही शिक्षा-रत्न पाया कि 'मनुष्य को सच्चरित्र होना चाहिए' इस अपने कथन में प्रमाण देना मानों पाठकों को अनभिज्ञ समझना है। क्योंकि आबालबृद्ध सभी सुचरित्र की सराहना करते हैं। जब यह निश्चित हुआ कि 'मनुष्य को सुचरित्र होना चाहिए' तो यह प्रश्न उठा कि सुचरित्र पुरुष संसार में कौन हुआ है जिसका अनुगमन अथवा अनुकरण करके हम सच्चरित्र बनें? प्रश्न के उठते ही उत्तर मिला कि 'रामचरित्र ही आदर्श रूप है' अतएव रामचरित्र देखने और समझने की इच्छा हुई। संस्कृत में अधिक अभ्यास न होने के कारण लोक में अधिक प्रचार को प्राप्त पूज्यपाद श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी की रामायण देखने लगा। कहने में कुछ खेद होता है कि उस अवस्था में मुझे अनेक पण्डित मिले, जिन्होंने 'तुलसीदास की रामायण' में यह कहकर कि भाषा है, इसका क्या प्रमाण है अपनी अश्रद्धा प्रकट की। कुछ मेरा चित्त भी दोलायमान हुआ, परन्तु भगवत्कृपा से मेरे मन में यह बात उदय हुई कि तुलसीदासजी ने स्वयं कहा है कि नानापुराणनिगमागमसम्मतं यदित्यादि अर्थात् यह तो अनेक पुराण और निगमागमसम्मत रामचरित्र है, इसके उदय होते ही अनेक प्रकार के परिश्रम और धनव्यय से मैंने तुलसीदासजी की उक्ति को नानापुराणनिगमागमसम्मत ही पाया।'[2]
महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह ने कठोर परिश्रम करके श्रीरामचरितमानस के मूलस्रोतों का उद्घाटन किया है। महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह ने अपनी वैदुष्यपूर्ण टीका से सिद्ध होता है कि गोस्वामी तुलसीदासजी ने निगमागमसम्मत और क्वचिदन्यतोऽपि रामचरितमानस की रचना करने के लिए 'बालकाण्ड' में 97, 161 'अवधकाण्ड' में 161, 'अरण्यकाण्ड' 44, 'किष्किन्धाकाण्ड' 71, 'सुन्दरकाण्ड' 53, 'लंकाकाण्ड' 32 एवं 'उत्तरकाण्ड' में 49 ग्रन्थों का मन्थन किया है। आज़ादी के पूर्व शारदा-सदन रायबरेली से प्राप्त होनेवाली महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह कृत 'श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासकृत रामायण' की इस टीका का साहित्य-जगत् में उतना प्रचार-प्रसार नहीं हो पाया, जितना होना चाहिए था। महात्मा अंजनीनन्दनशरण के 'मानसपीयूष' और स्वामी प्रज्ञानानन्द सरस्वती के 'मानस गूढ़ार्थ चन्द्रिका' की तरह ही उत्कृष्ट टीका होने के बाद भी बाबू रणबहादुर सिंह की इस टीका को न जाने क्यों हिन्दी-साहित्य के आलोचकों की उपेक्षा का दंश झेलना पड़ा। इतना ही नहीं इसके प्रकाशन के चालीस वर्ष बाद सन् 1971 ई. में अखिल भारतीय विक्रम परिषद्, काशी से आचार्य पण्डित सीताराम चतुर्वेदी द्वारा सम्पादित 'श्रीरामचरितमानस' की मारुति टीका का प्रकाशन हुआ, जिसके मूल में यही टीका है। आज साहित्य-जगत् आचार्य पण्डित सीताराम चतुर्वेदी कृत श्रीरामचरितमानस की मारुति टीका तो प्रसिद्ध है, किन्तु बाबू रणबहादुर सिंह की टीका से बहुत कम लोगों का परिचय है।
आचार्य पण्डित सीताराम चतुर्वेदी ने मारुति टीका की भूमिका में लिखा है- 'सम्पादकों, विद्वानों तथा मानस-मर्मज्ञों की इस सभा ने यह भी निश्चय किया कि गोस्वामीजी ने जिन जिन ग्रन्थों से सामग्री सँजोई है, उन ग्रन्थों के मूल स्रोत भी पाद-टिप्पणी में दिये जाँय जिससे रामायण के अध्येताओं को भी सुविधा हो और पाठ का शुद्ध अर्थ लगाने में भी सहायता मिले। यद्यपि सम्पादक-मण्डल ने यह भार स्वीकार तो कर लिया, तथापि पीछे चलकर यह ज्ञात होने लगा कि यह कार्य असम्भव नहीं तो दुरूह अवश्य है। इसी बीच काशी के सार्वभौम संस्कृत-प्रचार कार्यालय के मन्त्री पण्डित वासुदेव द्विवेदी ने व्याकरणाचार्य श्रीबाबूलाल त्रिपाठी के पास से शाहमऊ टिकारी के ताल्लुक़ेदार बाबू गंगावक्ष सिंह जी के अनुज बाबू रणबहादुर सिंह द्वारा 'अनेक कवि-कोविद' महात्माओं की सम्मति से तथा पण्डित मातृदत्तजी सोहगौर त्रिपाठी, पण्डित ललिताप्रसादजी ओझा, पण्डित दामोदरजी शर्मा, पण्डित रामपदार्थ सुकुलजी की सहायता से 27 वर्षों के सतत प्रयत्नों के उपरान्त वेदादि शास्त्रों के श्लोकों, प्रमाणों से प्रमाणीभूत श्लोकों के अर्थों और टिप्पणियों से 'अलंकृत' प्रकाशित संस्करण लाकर प्रस्तुत कर दिया जिससे यह कार्य सरल हो गया। उपर्युक्त ग्रन्थ में दिये हुए प्रमाणों के अतिरिक्त अन्य बहुत-से स्रोतों से भी इस संस्करण में सम-भाव-बोधक श्लोक प्रस्तुत कर दिये गये हैं।'[3]
आचार्य पण्डित सीताराम चतुर्वेदी ने बाबू रणबहादुर सिंह कृत इस टीका का उल्लेख करते हुए बाबू रणबहादुर सिंह की सारस्वत-साधना की अपेक्षा उनके सहयोगियों का उल्लेख करना ज़्यादा आवश्यक समझा। सहयोगियों की चर्चा में ज़्यादा रुचि होने के कारण आचार्य पण्डित सीताराम चतुर्वेदी ने हड़बड़ी में बाबू रणबहादुर सिंह के ज्येष्ठ भ्राता का नाम बाबू गंगाबख़्श सिंह न लिखकर बाबू गंगावक्ष सिंह लिख दिया है। इतना ही नहीं उनके सहयोगियों में पण्डित मातृदत्तजी सोहगौर त्रिपाठी एवं पण्डित ललिताप्रसादजी ओझा के अतिरिक्त अपनी तरफ से पण्डित दामोदरजी शर्मा और पण्डित रामपदार्थ सुकुलजी का नाम भी जोड़ दिया है, जबकि महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह कृत टीका में पण्डित मातृदत्तजी और पण्डित ललिताप्रसादजी के अतिरिक्त अन्य किसी का नामोल्लेख नहीं है। यद्यपि आचार्य पण्डित सीताराम चतुर्वेदी ने 'उपर्युक्त ग्रन्थ में दिये हुए प्रमाणों के अतिरिक्त अन्य बहुत-से स्रोतों से भी इस संस्करण में सम-भाव-बोधक श्लोक प्रस्तुत कर दिये गये हैं' लिखकर अपनी टीका की श्रेष्ठता सिद्ध करने का प्रयत्न किया है, तथापि बाबू रणबहादुर सिंह के द्वारा दिये गये स्रोतों के अतिरिक्त अन्य स्रोत यहाँ दृग्गत नहीं होते।
महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह कृत टीका के उद्धरणों के विषय में आचार्य पण्डित सीताराम चतुर्वेदी लिखते हैं- 'यह स्पष्ट कर देना नितान्त आवश्यक है कि उपर्युक्त शाहमऊ-टिकारीवाले संस्करण में जिन अनेक ग्रन्थों का उल्लेख किया गया है और जिनके प्रमाण दिये गये हैं, उनमें से बहुत-से ग्रन्थ ऐसे हैं, जिनका हमें दर्शन नहीं हो पाया और जो खोजने पर भी कहीं नहीं मिल पाये। इसलिए उनकी प्रामाणिकता का दायित्व पूर्णतः उपर्युक्त संस्करण पर ही है, किन्तु जहाँ तक प्रसिद्ध और सुलभ ग्रन्थों से प्राप्य उद्धरणों की बात है, वे पूर्णतः असन्दिग्ध हैं और उन्हें देखकर यह समझने में तनिक भी सन्देह नहीं रह जाता कि गोस्वामी तुलसीदासजी कितने असाधारण दिग्गज विद्वान् थे, जिन्होंने सम्पूर्ण भारतीय वाङ्मय (साहित्य और दर्शन) को हृदयंगम कर डाला था और अत्यन्त कौशल के साथ उस सम्पूर्ण ज्ञान-राशि को रामचरितमानस में इस प्रकार लाकर जड़ दिया जैसे कोई कुशल जौहरी आभूषणों में अनेक नगीने जड़कर दोनों को एक-दूसरे का कीर्तिमान् पूरक बना देता है। कहीं भी यह आभास तक नहीं मिलता कि गोस्वामीजी ने इसमें अनेक स्थानों से सामग्री ला जुटाई है। यही उनकी वास्तविक कुशलता एवं महत्ता है और यह सम्पादन ही उनकी मौलिकता है।'[4]
वस्तुतः आचार्य पण्डित सीताराम चतुर्वेदी के उपर्युक्त दोनों उद्धरण एक-दूसरे के विरोधी हैं। उन्होंने जहाँ पहले उद्धरण 'इसमें उपर्युक्त ग्रन्थ में दिये हुए प्रमाणों के अतिरिक्त अन्य बहुत-से स्रोतों से भी इस संस्करण में सम-भाव-बोधक श्लोक प्रस्तुत कर दिये गये हैं', लिखकर अपने श्रम और स्वाध्याय का प्रतिपादन किया है, वहीं दूसरे उद्धरण में 'शाहमऊ-टिकारीवाले संस्करण में जिन अनेक ग्रन्थों का उल्लेख किया गया है और जिनके प्रमाण दिये गये हैं, उनमें से बहुत-से ग्रन्थ ऐसे हैं, जिनका हमें दर्शन नहीं हो पाया और जो खोजने पर भी कहीं नहीं मिल पाये। इसलिए उनकी प्रामाणिकता का दायित्व पूर्णतः उपर्युक्त संस्करण पर ही है' लिखकर अपने आपको उत्तरापेक्षी होने से मुक्त भी कर लिया है। महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह कृत श्रमसाध्य एवं व्ययसाध्य टीका का उचित मूल्यांकन न करना, उनकी सारस्वत-साधना को अपना बनाकर प्रस्तुत कर देना आचार्य पण्डित सीताराम चतुर्वेदी जैसे मूर्धन्य मनीषी की कीर्ति-कौमुदी को कलंकित करता है। 'मारुति टीका' की व्याख्या और वैदुष्यपूर्ण टिप्पणियाँ जहाँ आचार्य चतुर्वेदी के पाण्डित्य को प्रदर्शित करती हैं, वहीं बाबू रणबहादुर सिंह की सारस्वत-साधना को नींव में रखकर दिये सम-भाव-बोधक श्लोकों की अविच्छिन्न श्रृंखलाएँ पण्डित सीताराम जी की साहित्यिक शुचिता पर प्रश्नचिह्न भी लगाती हैं।
विश्व-वन्द्य गोस्वामीजी की वाग्विभूति और महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह की नानापुराणनिगमागमसम्मत टीका एक-दूसरे की पूरक हैं। यहाँ गोस्वामीजी की कल्याणी वाणी और बाबू रणबहादुर सिंह की तत्त्वान्वेषिणी दृष्टि को कतिपय उद्धरणों से देखा जा सकता है-
(1)
जेहि सुमिरत सिधि होइ, गननायक करिवर वदन।
करौ अनुग्रह सोइ, बुद्धिरासि सुभ गुन सदन।।
मुहूर्तवृन्दावने
जायन्ते सिद्ध्यो यस्य स्मरणात्स गजाननः।
कुर्यादनुग्रहं बुद्धिनाथः शुभगुणाकरः।।[5]
(2)
मूक होइ वाचाल, पंगु चढ़ै गिरिवर गहन।
जासु कृपा सो दयालु, द्रवउ सकल कलिमल दहन।।
महाभारते
मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम्।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्।।[6]
(3)
नील सरोरुह श्याम, तरुन अरुन वारिज नयन।
करो सो मम उर धाम, सदा छीरसागर सयन।।
नारदपञ्चरात्रे
नीलाम्बुतनुं दिव्यमरुणाम्बुजलोचनम्।
स्मरामि हृदि तं देवं क्षीरसागरशायिनम्।।[7]
(4)
कुन्द इन्दु सम देह, उमारमन करुना अयन।
जाहि दीन पर नेह, करौ कृपा मर्दन मयन।।
उमासंहितायाम्
कुन्देन्दुकर्पूरतनुर्ह्युमेशः करुणार्णवः।
दीनस्नेहकरः कुर्यात्कृपां मदनमर्दनः।।[8]
(5)
बन्दौ गुरुपदकंज, कृपसिन्धु नररूप हरि।
महामोह तमपुंज, जासु बचन रविकर निकर।।
जाबालिसंहितायाम्
वन्दे गुरुपदाब्जं यो नररूपः स्वयं हरिः।
यद्वाक्यसूर्योदयतस्तमो नश्यति साम्प्रम्।।[9]
(6)
बन्दौं गुरुपदपदुमपरागा। सुरुचि सुवास सरस अनुरागा।।
अमिय मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भवरुज परिवारू।।
सुकृत शम्भुतन विमल विभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती।।
जन मन मंजु मुकुर मलहरनी। किये तिलक गुनगन वसकरनी।।
पुलस्त्यसंहितायाम्
गुरुपादरजो वन्दे चारुचूर्णं मलापहम्।
पुण्येशभूतिर्मङ्गल्यं मनोमुकुरमार्जकम्।।[10]
(7)
श्रीगुरुपदनख मनिगन जोती। सुमिरत दिव्यदृष्टि हिय होती।।
दलन मोहतम सो सुप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू।।
वसिष्ठपुराणे
गुरुपादनखज्योत्स्ना तमोहन्त्री प्रकाशिका।
ज्ञानरत्नसमूहस्या विद्यारात्रिविनाशिनी।।[11]
(8)
उघरहिं बिमल बिलोचन ही के। मिटहिं दोष दुख भवरजनी के।।
सूझहिं रामचरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक।।
पद्मपुराणे
गुरुपादनखज्योत्स्नास्मराद्धृदयलोचनम्।
गुप्तं च मणिमाणिक्यरूपं पश्यति केशवम्।।[12]
इसी तरह सम्पूर्ण मानस के सम-भाव-बोधक श्लोकों को ढूँढ़कर बाबू रणबहादुर सिंह ने अपनी नानापुराणनिगमागमसम्मता टीका को अलंकृत किया है। इन्हीं श्लोकों को आचार्य पण्डित सीताराम चतुर्वेदी ने अपनी 'मारुति टीका' में यथावत उद्धृत कर दिया है।[13]
वस्तुतः महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह ने श्रीरामचरितमानस की 'नानापुराणनिगमागमसम्मत टीका' तैयार करने के लिए 'कवि-कोविदों' की एक परिषद् बनाया था और उस परिषद् के सदस्यों के सम्पूर्ण पारिवारिक दायित्व का निर्वहन स्वयं किया था। इस दायित्व-निर्वहन में शाहमऊ-टिकारी से गुजारे में प्राप्त 'बेरारा' गाँव भी बिक गया था। जिस कार्य को बाबू रणबहादुर सिंह ने अपने सीमित संसाधन के बल पर पूर्ण किया था, उसे आज की साहित्य अकादमियाँ वृहद् परियोजनाएँ बनाकर भी पूर्ण नहीं कर सकती हैं। भले ही आज महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह की सारस्वत-साधना उचित मूल्यांकन के अभाव में अन्धकाराच्छन्न हो गयी है, किन्तु विद्या कभी वन्ध्या नहीं होती। कभी-न-कभी किसी मल्लिनाथ की सहृदय दृष्टि उस पर अवश्य पड़ेगी और पुनः बाबू रणबहादुर सिंह की सारस्वत-साधना साहित्याम्बर के क्षितिज पर उदित होगी। निश्चय ही आज ऐसे आलोचकों की महती आवश्यकता है, जो नेपथ्य में पड़े साहित्य-देवताओं को प्रकाशित कर सके।
सन्दर्भ 1. पवन बख़्शी : अवध के तालुक़दार : रूपा पब्लिकेशन्स् इण्डिया प्राइवेट लिमिटेड, 7/16, अंसारी रोड, नई दिल्ली, द्वितीय संस्करण 2012 ई., पृ. 428
2. बाबू रणबहादुर सिंह : श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासकृत रामायण की नानापुराणनिगमागमसम्मता टीका, सुन्दरकाण्ड की भूमिका, 1922 ई.
3. आचार्य पण्डित सीताराम चतुर्वेदी : श्रीरामचरितमानस : अखिल भारतीय विक्रम परिषद्, काशी, प्रथम संस्करण 1971 ई., पृ. 12
4. आचार्य पण्डित सीताराम चतुर्वेदी : तदेव, पृ. 12
5. बाबू रणबहादुर सिंह : श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासकृत रामायण की नानापुराणनिगमागमसम्मता टीका, बालकाण्ड, 1930 ई., पृ. 8
6. बाबू रणबहादुर सिंह : तदेव, पृ. 9
7. बाबू रणबहादुर सिंह : तदेव, पृ. 9
8. बाबू रणबहादुर सिंह : तदेव, पृ. 10
9. बाबू रणबहादुर सिंह : तदेव, पृ. 10
10. बाबू रणबहादुर सिंह : तदेव, पृ. 11
11. बाबू रणबहादुर सिंह : तदेव, पृ. 11
12. बाबू रणबहादुर सिंह : तदेव, पृ. 12
13. आचार्य पण्डित सीताराम चतुर्वेदी : मारुति टीका, पृ. 3-4

- डॉ. जितेन्द्रकुमार सिंह 'संजय' जी द्वारा किये गये शोध से साभार 

गुरुवार, 3 मई 2018

रायबरेली के गौरव स्वर्गीय श्रीमान राजा शिवदीन सिंह बारी



राजा शिवदीन सिंह बारी के पिता स्वर्गीय वख्तावर सिंह बारी जिला रायबरेली के निवासी थे जो महाराजा राणा सा0 रायबरेली की फ़ौज में श्रेष्ट सिपाही जमादार के पद पर कार्यरत थे बेतिया जिला के ताल्लुकेदार श्री जगमोहन सिंह के पास राणा सा0 रायबरेली का खजाना कई वर्षो का इकट्ठा हो गया था जगमोहन सिंह बागी थे जब कभी कोई कर्मचारी राजा साहब का मामला वसूल करने जाता था वह भगा दिया जाता था राणा साहब अपने सिपाहियो व् सरदारो के वीच पान का बीड़ा रखा जिसे उठाने में सभी थर्रा गए किसी की हिम्मत न हुई उसी दरमियान श्रेष्ट सिपाही जमादार शिवदीन बारी लपक कर बीड़ा उठाया और चबा कर बोला की सरकार चिंता मत करियो उनसे रकम हम बसूल करेगे शिवदीन अपने साथी वीर सिपाहियो को लेकर बेतिया के लिए प्रस्थानित हो गए ताल्लुकेदार सा0 के स्थान के करीब पहुचने पर अपने सिपहियो को इधर उधर छिपा दिया और कहा की जब हमारी सींटी बजेगी तब फ़ौरन दौड़ पड़ना शिवदीन अकेले मिलने गए मिलने पर इधर उधर की मिली जुली बाते करने लगे शिवदीन ने कहा की श्रीमान जी आप राणा साहब को क्यों नाराज करते हो?
उनको थोडा खजाना देते जाइये ताकि उनके भी दिल में किसी प्रकार का दुःख न हो और ऐसा करने से आप की भी भलाई है इस प्रकार की सुझाव से भरी बाते सुनकर जगमोहन सिंह रोष में भर आये और बोले की मालूम होता है की आप देन बसूल करने आये हो नहीं ! नहीं! सरकार में तो आप का दर्शन करने आया हु परन्तु जब आप को किसी प्रकार मानना ही नहीं है तो यही मान लीजिये की देन ही बसूल करने आया हु जगमोहन कड़क कर बोले की चल चल बड़ा वसूल कूनिन्दा बनकर आया है तेरे जैसे बारियो से में पत्तल में खीला लगाने बाला बारी नहीं हु में तुम जैसे लोगो के सीने में खीला लगाता हु इतना सुनते ही शिवदीन ने उसकी कलाई पकड़ ली और सींटी बजा दी छिपे हुए सिपाही कूद पड़े और जगमोहन को पकड़ कर अपने हिरासत में कर लिया शिवदीन ने सेना के जवानो को हुक्म दिया की इनका खजाना लूट लिया जाए राणा की नजर गुजारो सिपाहियो ने खजाना की सारी सम्पति लूटकर खच्चरों में लाद लिया और चल दिए जगमोहन सिंह हिरासत से भागकर बेतवा नदी में कूद पड़ा शिवदीन भी म्यान से तलवार निकाल कर नदी में कूद पड़े और उसका सर काटकर मय खजाना के बापिस आये
राणा साहब शिवदीन के इस वीरोचित कार्य से प्रसन्न होकर शिवदीन बारी को सिंह तथा राजा की पदवी देकर भवानी गढ़ का इलाका दे दिया शिवदीन सिंह बारी को बारी संसार के अतिरिक्त
भवानीगढ़ तहसील शिवगढ़ रायबरेली में राजा शिव दीन बारी का किला
इतिहासकार
भी जानते है रायबरेली जिला के अंतर्गत बछरावां तहसील के भवानी गढ़ का किला अब भी उस महान वीर की गाथा गया रहा

एक और जलियाँवाला जो रायबरेली की सरजमीं पर हुआ

सन १९२०-२१ का किसान-आंदोलन अपने ढंग का नया और प्रभावाशाली आंदोलन था। यह आंदोलन अवध के किसानों द्वारा जलियाँवाला बाग हत्याकांड के तत्काल बाद ही प्रारंभ हुआ था। लेकिन इसकी उग्रता सन १९२० के अंत और सन १९२१ के प्रारंभ में चरम सीमा पर पहुँच गयी थी। अवध के तालुकेदारों, जमींदारों तथा राजाओं के अत्याचारों से पीड़ित किसान एकदम से विद्रोह कर बैठे। इन किसानों का नेतृत्व कुछ उग्रपंथी नेताओं तथा साधु-सन्यासियों ने ठीक उसी प्रकार किया, जैसे सन १८५७ में किया था। https://youtu.be/fxl6VYNQu4I
सन १८५७ में अनेक साधु तथा फकीरों ने ‘रोटी और कलम’ के प्रतीकों द्वारा क्रांति का प्रचार किया था। लेकिन इन साधु-सन्यासियों के पास ‘रोटी और कलम’ जैसे प्रतीक न थे। इनके पास एक धार्मिक नारा था- ‘‘सीताराम!’’ कहा जाता है कि इस नारे की ध्वनि कानों में पड़ते ही जो किसान जहाँ रहता था, वहीं वह काम बंद कर देता था। यह ध्वनि एक किसान से दूसरे किसान तक विद्युत-वेग से पहुँच जाती थी। ‘सीताराम’ शब्द कानों में पड़ते ही पूर्ण हड़ताल-सी हो जाती थी और लोग सभा अथवा जुलूस में पहुँच जाते थे। रास्ते में यदि कोई हल जोतता, फावड़ा चलाता, अथवा पुरवाही करता दिखायी पड़ता, तो उसका भी ध्यान ‘सीताराम’ कहकर आकर्षित किया जाता। वह तत्काल अपना हल, फावड़ा तथा पुर वहीं छोड़कर चल पड़ता।

किसान-सभा का जन्म

अवध के किसानों की भावनाओं का परिचय कुछ तथाकथित किसान नेताओं को मिल चुका था। वे इसे संगठनात्मक रूप देने के लिए आगे बढ़े। ‘अवध किसान सभा’ नामक एक संस्था की भी स्थापना की। इस किसान सभा की नियमावली बनायी गई थी। अवध के किसान-आंदोलन के साथ भारतीय इतिहासकारों ने न्याय नहीं किया है। यदि पं. जवाहरलाल नेहरू इसका उल्लेख ‘मेरी कहानी’ में न करते, तो आज इस आंदोलन का कोई नाम भी न लेता। सन १८५७ के प्रथम स्वाधीनता-संग्राम में अवध के किसानों ने खुलकर फिरंगी सेना का सामना किया था। बाद में सरकार और किसानों के मध्य तालुकेदारों की कड़ी थी। दोनों मिलकर किसानों को दबाने लगे। तालुकेदारों की नीति का पालन उनके अहलकार-मैनेजर, मुख्तार, जिलेदार तथा सिपाही करते थे। वे लगान वसूल करते थे। तालुकेदार अपनी विलासिता तथा उपभोग की वस्तुएँ खरीदने के लिए भी चंदा लगाया करते थे। जैसे हाथी खरीदने के लिए- ‘हाथीवान टैक्स लगता था।

कुछ प्रामाणिक तथ्य

यह थी, अवध और रायबरेली जिले कि किसानों की दुर्दशा। जिले के वयोवृद्ध कांग्रेसी नेता मुंशी सत्यनारायण श्रीवास्तव ने लिखा है- ‘‘बेदखली की तलवार यहाँ के किसानों की गर्दन पर हर वक्त लटकती रहती थी। अवध का किसान तालुकेदारों के जुल्मों से आजिज आ गया था। रायबरेली जिले में जगह-जगह किसानों ने तालुकेदारों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था। बदमाशों को मौका मिला और किसानों को गुमराह कराकर फुरसतगंज, करहिया बाजार आदि स्थानों पर लूट करा दी।’’

सन १९२०-२१ के ऐतिहासिक किसान-आंदोलन का उल्लेख करते हुए पं. अंजनीकुमार ने लिखा है- ‘‘इस आंदोलन का आरंभ क्यों और कैसे हुआ, इसको बताने के लिए यह आवश्यक है कि पहले यह बता दिया जाए कि सन १९२० व उसके पहले यहाँ के किसानों की स्थिति व दशा कैसी थी। तालुकेदारी प्रथा थी। तालुकेदार अपने को राजा कहते थे।’’

अवध के किसान आंदोलन का पहला धमाका प्रतापगढ़ में हुआ। दो सौ किसानों के एक जत्थे ने इलाहाबाद जाकर नेहरूजी से भेंट की, फलतः वे स्वयं प्रतापगढ़ गये और उन्होंने किसानों को समझाया-बुझाया। उनके लौटते ही ब्रिटिश सरकार का दमन-चक्र पुनः शुरू हो गया। बड़े पैमाने पर किसानों की गिरफ्तारी की गयी। फलतः किसानों में उत्तेजना बढ़ी और एक दिन उन्होंने जिला कारागार पर आक्रमण कर दिया। फलतः सरकार को बंदियों को छोड़ना पड़ा। अब वे रायबरेली की ओर बढ़े। दिनांक चार जनवरी को रुस्तमपुर बाजार में किसानों की एक सभा होने वाली थी। उस दिन सभा प्रारंभ भी नहीं होने पायी थी कि बाजार लूटने की अफवाह फैल गयी। कहा जाता है, भीड़ से कुछ गुंडों ने बाजार में हल्ला बोल दिया। इसी दिन डीह के बाजार को भी लूटे जाने का समाचार फैल गया। अगले दिन नसीहाबाद का बाजार लूटे जाने की भी अफवाह फैली। फलतः किसानों पर तालुकेदारों के गुंडों और ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचार पहले से ज्यादा बढ़ गये।

चंदनिहा-कांड

डलमऊ तहसील में चंदनिहा नामक एक छोटी-सी तालुकेदारी रियासत थी। यहाँ के तालुकेदार एक ठाकुर थे। ‘अच्छी जान’ नाम की एक वेश्या उनकी रखैल थी। वास्तव में रियासत की वही शासिका थी। अच्छी जान के कार्यकलापों से क्षेत्रीय किसान पहले से ही क्षुब्ध थे। उसी समय, जब कि किसानों की उत्तेजना विस्फोट का रूप धारण करने वाली थी, उसकी एक हरकत ने आग में घी का काम किया। दूसरे शब्दों में मुंशीगंज गोलीकांड की पृष्ठभूमि में यदि गंभीरतापूर्वक विचार किया जाए तो दो चेहरे सामने आते हैं- अच्छी जान और सरदार वीरपाल सिंह! अच्छी जान ने, कहा जाता है कि, एक किसान निहाल सिंह रामप्रताप सिंह की फसल को नष्ट करवा दिया। हो सकता है, यह कांड तालुकेदार के इशारे पर अथवा स्वेच्छा से उनके कारिदों ने किया हो, किंतु बदनाम अच्छी जान के शीश पर ही यह कलंक मढ़ा गया। इस फसल के नष्ट होते ही किसानों का ज्वालामुखी आग-लावा उगलने लगे।

कोठी का घेराव

बाबा जानकीदास, पं. अमोल शर्मा, मुंशी कालिकाप्रसाद आदि किसान नेताओं के नेतृत्व में तीन हजार से अधिक किसानों का हुजूम चंदनिहा पहुँचा। उसने चारों ओर से तालुकेदार साहब की कोठी घेर ली। वायुमंडल ‘गांधी जी की जय’ , ‘बाबा रामचन्द्र की जय’ , ‘पं. जवाहरलाल की जय’ के साथ-साथ ‘सीता-राम’ के रणघोष से काँप-काँप उठता था। हजारों किसानों का उत्तेजित जनसमूह नारे लगा रहा था। अपनी मांगों की पूर्ति के लिए आवाज उठा रहा था। ठीक उसी समय जिला मजिस्ट्रेट श्री ए. जी. शेरिफ तालुकेदार के निवेदन पर पुलिस फोर्स लेकर मौके पर पहुँच गये। ठा. चन्द्रपाल सिंह तथा अमोल शर्मा को अपनी गाड़ी में बैठा लिया। इसी समय यह अफवाह फैल गयी कि रायबरेली में तीनों नेताओं की हत्या कर दी गयी है।

इसी समय एक और ‘धमाका’ हो गया। वह था फुरसतगंज गोलीकांड। इस गोलीकांड ने रही-सही जो भी कसर थी, उसे पूरा कर दिया: ५ जनवरी को चंदनिहा कांड हुआ था। ६ जनवरी को किसान-नेताओं की हत्या की अफवाह प्रचारित हुई। ठीक उसी तिथि को फुरसतगंज में गोलीकांड भी हो गया, जिसमें लगभग तीन हजार किसान की भीड़ पर निर्दयतापूर्वक गोली वर्षा की गयी। इसी परिस्थिति ने सात जनवरी को मुंशीगंज का ऐतिहासिक गोलीकांड करा दिया।

मुंशीगंज गोलीकांड की परिस्थितियाँ, स्थान और वातावरण की विभीषिका ठीक जलियाँवाला कांड-जैसी थी। रायबरेली के मुंशीगंज गोलीकांड स्थल की रचना भी कुछ ऐसी ही थी। एक ओर सई नदी की धारा थी। पुल पर बैलगाड़ियाँ इकट्ठी करके रास्ता रोक दिया गया था। पुल के इस पार सशस्त्र सेना खड़ी थी। नदी के पुल के उस पार जहाँ किसानों का अपार जन-समुद्र लहरा रहा था, एक ओर रेलवे लाइन थी, लाइन इतनी ऊँचाई पर थी कि वह दीवार का काम कर रही थी। लाइन के नीचे तार के खंभे थे। पीछे की ओर बाग, सरपत पुंज और रेलवे फाटक था। सड़क और रेल की पटरी के मध्य त्रिकोणात्मक स्थान किसानों का जमाव-स्थल था, जिनके भागने का कहीं भी रास्ता न था। इस भीड़ को शांत करने के लिए बाबू किस्मत राय उसी प्रकार भाषण दे रहे थे जैसे जलियाँवाला बाग में हंसराज। यह स्थान रायबरेली शहर से लगभग दो मील की दूरी पर था। ऐसी थी मुंशीगंज गोलीकांड स्थल की रचना।

किसानों का जमाव

जिले के किसान नेताओं ने एक दिन पूर्व ही स्थिति की गंभीरता देखकर पं. जवाहरलाल नेहरू को तार कर दिया था। अधिकारियों ने रातोंरात सेना बुला ली। किसानों का समूह नदी पार न करने पाये, इसके लिए उन्होंने पुल पर बैलगाड़ियाँ खड़ी करके, मार्ग अवरुद्ध कर दिया था। पुल के इस पार सशस्त्र सेना थी। किसानों की भीड़ जेलखाने तक जाकर अपने नेताओं को देखना चाहती थी। ९ बजते-बजते सई नदी की रेती में अपार जनसमुद्र हिलोरें लेने लगा। जनरव एवं जयघोषों से आकाश गूँज उठा। एक ओर किसानों का अपार जन-समूह दूसरी ओर सशस्त्र सेना।

खुरेहटी के तालुकेदार सरदार वीरपाल सिंह एम. एल. सी. ने इस कांड के ‘हीरो’ का रोल अदा किया। उन्हें भय था कि किसानों का आक्रमण जिला कारागार के अतिरिक्त उनकी कोठी पर भी हो सकता है। तालुकेदारी के मद में चूर, एम. एल. सी. का पोर्टफोलियो साफे में लपेटे सरदार वीरपाल सिंह लगभग १० बजे जिलाधिकारी मि. ए. जी. शेरिफ के पास पहुँचे। मि. शेरिफ के संबंध में कहा जाता है कि वे बड़े ही शिष्ट, विद्वान तथा विनम्र व्यक्ति थे। वे अंग्रेजी के साथ-साथ संस्कृत के भी विद्वान थे।

श्री शेरिफ के अनुसार, उस वक्त वहाँ सात हजार से दस हजार तक की भीड़ थी। स्त्रियों को छोड़ सबके हाथों में लाठियाँ थीं। यह भीड़ बड़ी मुश्किल से पीछे हट रही थी। भीड़ को दो सौ गज पीछे हटाने में लगभग एक घंटा लगा। इसी बीच भीड़ छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट गयी। तभी किसी ने गोली चला दी। इसके बाद तो किसानों पर अंधाधुंध गोली वर्षा हुई। सई नदी की रेत लहूलुहान हो गयी। नदी का पानी लाल हो गया। रातों रात लाशें फौजी ट्रकों में भरकर डलमऊ भेज दी गयीं। रात में इधर-उधर खोजने पर जो लाशें मिली उन्हें सामूहिक रूप से रेत में गाड़ दिया गया। कुछ असमर्थ घायलों को अस्पताल भेज दिया गया। लोगों का अनुमान है कि पहली गोली सरदार वीरपाल सिंह ने चलायी थी।

जिस समय यह गोलीकांड हो रहा था, उस समय पं. नेहरू नदी के दूसरे पार पहुँच चुके थे। वे पुल पार कर गोलीकांड वाले स्थान पर जाना चाहते थे, लेकिन एक अंग्रेज अफसर ने उन्हें उस पार जाने नहीं दिया। बाद में पं. नेहरू ने ‘दैनिक इंडिपेंडेंट’ के १३ जनवरी १९२१ के अंक में इस घटना पर दो किश्तों में एक लेख भी लिखा। अपनी आत्मकथा में भी उन्होंने मुंशीगंज गोलीकांड का उल्लेख किया है।

११ अगस्त २०१४
                              साभार अमरेश बहादुर अमरेश

मंगलवार, 1 मई 2018

प्रेरणा दायक कथा

बुद्ध एक गांव में गए थे। एक अंधे आदमी को कुछ लोग उनके पास लाए और उन मित्रों ने कहा कि यह आदमी अंधा है और हम इसके परम मित्र हैं। और हम इसे सब भांति समझाने की कोशिश करते हैं कि प्रकाश है, लेकिन यह मानने को राजी नहीं होता और इसकी दलीलें ऐसी हैं कि हम हार जाते हैं। और हम जानते हैं कि प्रकाश है, हमें देखते हुए हारना पड़ता है। यह आदमी हमसे कहता है, मैं प्रकाश को छूकर देखना चाहता हूं। अब हम प्रकाश का स्पर्श कैसे करवाएं? यह आदमी कहता है छोड़ो, स्पर्श न हो सके तो मैं सुन कर देखना चाहता हूं मेरे पास कान हैं। तुम प्रकाश में आवाज करो, मैं सुन लूं। छोड़ो, यह भी न हो सके तो मैं स्वाद लेकर देख लूं या प्रकाश में कोई गंध हो तो गंध लेकर देख लूं।

कोई उपाय नहीं है। प्रकाश तो आंख से देखा जा सकता है और आंख इसके पास नहीं है। और यह आदमी यह कहता है कि तुम फिजूल ही मुझे अंधा सिद्ध करने को प्रकाश की बातें करते हो। तुम भी अंधे मालूम होते हो, प्रकाश की ईजाद तुमने मुझे अंधा बताने के लिए तय कर ली है। तो हमने सोचा, आप इस गांव में आए हैं, शायद आप इसको समझा सकें।

बुद्ध ने कहा कि मैं इसे समझाने के पागलपन में नहीं पडूगा। आदमी की आज तक मुसीबत ही उन लोगों ने की है जिन लोगों ने आदमी को ऐसी बातें समझाने की कोशिशें की हैं जो उनको दिखाई नहीं पड़ती। मनुष्य के ऊपर उपदेशक बड़ी महामारी सिद्ध हुआ है। वे ऐसी बातें समझाता है जो उसको दिखाई नहीं पड़ती।

तो बुद्ध ने कहा कि मैं यह गलती करने वाला नहीं हूं और मैं यह समझाने वाला नहीं हूं कि प्रकाश है। मैं तो इतना कह सकता हूं कि इस आदमी को तुम गलत जगह ले आए हो। मेरे पास लाने की जरूरत न थी। किसी वैद्य के पास ले जाओ जो इसकी आंख का इलाज कर सके। इसे उपदेश की नहीं, उपचार की जरूरत है। तुम्हारे समझाने का सवाल नहीं, तुम्हारी समझाई गई बात पर विश्वास करने का सवाल नहीं। इसकी आंख ठीक होनी चाहिए। और आंख ठीक हो जाए तो तुम्हें समझाने की जरूरत न पडेगी, यह खुद ही देख सकेगा, खुद ही जान सकेगा।

उनको बात ठीक जंची। बुद्ध ने कहा है कि मैं तो धर्म को उपदेश नहीं मानता हूं उपचार मानता हूं। तो इसे ले जाओ। वे उस अंधे को ले गए और भाग्य की बात थी कि वह अंधा कुछ महीनों के इलाज से ठीक हो गया। बुद्ध तो दूसरे गांव चले गए थे। वह अंधा आदमी ठीक हो गया था। वह बुद्ध के चरण छूने गया और उसने उन्हें प्रणाम किया और उसने कहा कि मैं गलती में था। प्रकाश तो था, लेकिन मेरे पास आंख नहीं थी। लेकिन बुद्ध ने कहा तू गलती में जरूर था, लेकिन तूने जिद्द की कि जब तक आंख न होगी तब तक मैं मानने को राजी न होऊंगा, तो तेरे आंख का इलाज भी हो सका। अगर तू मान लेता उन मित्रों की बात कि तुम कहते हो तो ठीक है, तो बात वहीं खत्म हो जाती। आंख के इलाज का सवाल भी नहीं उठता।

जो लोग विश्वास कर लेते हैं, वे विवेक तक नहीं पहुंच पाते। जो लोग चुपचाप स्वीकार कर लेते हैं, वे स्वयं के अनुभव तक नहीं पहुंच पाते। जो अंधे हैं और पकड़ लेते हैं कि दूसरे कहते हैं प्रकाश है तो जरूर होगा, फिर उनकी यात्रा वहीं बंद हो जाती है। यात्रा तो तब होती है जब बेचैनी बनी रहे, बनी रहे, बनी रहे, बेचैनी छूटे नहीं। और बेचैनी तभी होती है जब मुझे लगता है कि कोई चीज है, लोग कहते हैं लेकिन मुझे दिखाई नहीं पड़ती तो मैं कैसे मान लूं? मैं ही देखूं तो मानूं! यह बेचैनी मन में हो कि मेरे पास आंख हो तो मैं स्वीकार करूं।

ओशो

तिरगें को नमन

झूमे धरती झूमे अंबर झूमता है दिग - दिगंत  भूली बिसरी यादें लेके आया है 15 अगस्त करू तिरंगे को नमन सर झुका कर आंख नम  ऐ शहीदों आप क...