संत श्री जगजीवन साहेब का जन्म बाराबंकी जिले में घाघरा नदी तट की ग्राम सरदार के एक चंदेल क्षत्रिय परिवार में संवत 1727 विक्रमी माघ शुक्ल सप्तमी दिन मंगलवार (7 फरवरी 1670 ईस्वी) को प्रातः काल की बेला में हुआ था। पूर्व जन्म संस्कारों के प्रतिफलन में बालपन से ही उनमें सात्विक स्वभाव, प्राणियों से प्रेम और साधु सेवा का भाव उदय हुआ। किशोरावस्था पहुंचते ही उन्होंने गुरुसडी - गोंडा के प्रसिद्ध संत विशेश्वर पुरी से दीक्षा और मंत्र लेकर साधना रथ हो गए। नाम जप से प्रारंभ कर अजपा जप, सूरत साधना व निर्गुण ब्रह्म की उपासना की ओर वह बढ़ते चले गए। ग्रहस्थ जीवन अपना कर भी गहरी लगन, तन्मयता, शुद्ध सात्विक जीवन व समर्पण भाव के बल पर वे प्रायः समाधि और ज्योतित ब्रह्मानुभूति में डूब जाते थे। उनकी उच्च आध्यात्मिकता और तेजस्विता से प्रभावित हो अनेक भक्ति निकट जुड़ने लगे। 38 वर्ष की आयु तक संत श्री की ख्याति दिग-दिगंत में फैल चुकी थी। उस समय तक उनके 87 मुख्य शिष्य, आध्यात्म की प्रबल धारा में डूब, सतनाम पंथ के प्रसार में जो चुके थे, जन्म स्थान में साधना में विघ्न पाकर संत श्री कोट वन (वर्तमान कोटवाधाम) में आ विराजे और जीवन पर्यंत यही रहे। समर्थ गुरु ने भ्रमित समाज को जागृत करने और सच्चे धर्म की ओर मोड़ने के लिए "मूल गद्दी कोटवाधाम" के अंतर्गत चार आधार स्तंभ (चार पावा) स्थापित किया। श्री गोसाई दास जी (कमोली धाम), श्री दुलन दास जी (धर्मे धाम), श्री देवी दास जी (पुरवा धाम) पूरे देवीदास और श्री ख्याम दास जी (मधनापुर धाम), संत श्री द्वारा घोषित आदि महंत बने। संत श्री के समान यह सभी उच्च कोटि के गृहस्थ साधक थे। एक सतनामी ग्रंथ के अनुसार -
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जग जीवन धारा सलिल, दूलन दास जहाज।
देवीदास केवट सरिस, तारयो सकल समाज।।
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इन चार स्तंभों के अतिरिक्त साधना स्तर के अनुसार 14 गद्दीधर, 36 भजनिया, 33 सुमिरिनिहा महंतों व भक्तों की श्रंखला खड़ी हो गई जो उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में फैले हुए थे। संत श्री ने साधना उपलब्धि को सराहा, कुल और वर्ण को नहीं। इसी कारण उन्होंने कुर्मी, कोरी, धुनिया, मुराई, रैदास, कायस्थ, बनिया, यादव, पंजाबी आदि सभी जातियों और मुस्लिम वर्ग के सतनाम भक्ति धारा से अनुप्रमाणित भक्तों को महंत गद्दीधर के पद दिया। समर्थ गुरु जगजीवन साहब ने जटिल पूजा पाठ, मिथ्या कर्मकांड, सकाम तीर्थ स्नान और यज्ञ-पुरश्चरण के स्थान पर शुद्ध जीवन अपना कर निस्वार्थ भाव से माया-लिप्सा से दूर रहकर नाम-जप का उपदेश दिया। ईश्वर प्राप्ति व मन की शांति के लिए बन बन भटकने के स्थान पर गृहस्थ रूप में रहकर भी ममत्व, अहंकार एवं इंद्रिय दासता से परे हट सार्थक जीवन जिया जा सकता है और उच्चतम साधना की जा सकती है यही उन्होंने अपने जीवन में चरितार्थ किया। भक्तों पर कृपा कर उन्हें भी उसी मार्ग में आगे बढ़ा सूरत साधना में रत कर दिया। समर्थ गुरु एवं शिष्यों की उच्च साधना के फल स्वरुप अनेक अनहोनी घटनाएं जन जन को देखने को मिली, जो कीरत सागर नामक ग्रंथ में वर्णित है। ये प्रकट करती है कि साधक ईश्वर के समान सामर्थवान बन जाता है, एवं करुणा वश उन्हें प्रकट कर देता है। संत श्री का सारा जोर सहज निर्मल जीवन जीने, माया और आसक्ति में न फंसने, नाम जप का आश्रय ले सूरत ध्यान में डूब जाने, एवं साधु सेवा व सत्संग पर दिया गया है वह परम तत्व सातवें लोक में ना होकर जन जन के अंतर स्थल में समाया है, इसीलिए बाहर भटकने के बजाय सारी शक्तियों को अंतर्मुखी कर हृदय स्थल में उसे खोजने, उसको पाने की गहरी ललक जगाने और गहनतम व्याकुलता के बल पर उस तक पहुंचा जा सकता है। जिसमे "स्व" व देहभाव पूर्ण रुप से विगलित हो शून्यमय हो जाता है। उसी शून्य दशा में सीमातिक्रमण हो परम सत्ता का अवतरण होता है अचानक जीवन का स्वरुप बदल जाता है अलौकिक ज्योति के दर्शन कर भक्त परम आनंद में डूब जाता है ऐसा मिलन होने पर सृष्टि का कण-कण ईश्वर में लगने लगता है। प्रारंभ में यह दशा क्षणिक होती है परंतु भक्त साधना के बल पर उसे दृढतर कर स्थायित्व देता है। संसार से भागकर, उससे लड़कर, उसे नहीं जीता जा सकता है। आखिर वह भी तो उसी परमसत्ता की रचना है, उसी का अंश रूप है। छोड़ना "मन" का धर्म है नाकी शरीर का इसलिए दूर हट कर भी न "मैं" छूटता है, न माया और न इंद्रिय सुख। मन को जकड़ कर बांध लिया तो घर संसार में रहकर भी क्या बिगड़ेगा? संत जगजीवन साहब ने गृहस्थो से कहा -
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अल्प आहार, स्वल्प ही निद्रा, दया क्षमा प्रभु प्रीत।
शील संतोष सदा निरवाहो, है वह त्रिगुणातीत।।
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संत श्री ने 27 ग्रंथ लिखवाएं, जिन्हें उत्तराधिकारी संतों द्वारा 13 स्वतंत्र व 14 लघु ग्रंथों को 5 में संयुक्त कर 18 ग्रंथ बताए गए हैं। उनमें से "अघबिनास" प्रमुख है। जो कि साधना पंथ का मार्गदर्शक है। इसे संत श्री ने शिष्य, विष्णुदास मुल्तानी के द्वारा सन 1721-23 ईसवी में लिखवाया। इसमें भक्ति, वैराग्य, सगुण - निर्गुण और मोह - माया, लिप्सा आदि का विवेचन है। जो कि चार संवादों के मध्य पिरोया है ..... । (SSD/३१/०५/१८/संकलित अंश "अघबिनास" ग्रंथ आमुख)
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जय जगजीवन, जय सतनाम!
अघम उद्धारन, श्री कोटवाधाम!!
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गुरुवार, 31 मई 2018
संत श्री जगजीवन साहेब कोटवा बाराबंकी
रविवार, 27 मई 2018
रंडी मेरे लिए प्रेरणा है
पहली बार उसे रंडी तब बोला गया जब वह करीब 8 साल की थी. घर में किसी ने गाली दी थी. शायद बड़ी या छोटी दादी में से कोई थी. घर का माहौल ऐसा था कि वहां गाली खाना और गाली देना आम बात थी. तब उसे रंडी का मतलब नहीं पता था. वो लड़कों के साथ लड़कों की तरह दिनभर उछलकूद करती थी. शायद ये बात दादी को ठीक नहीं लगी थी. इसीलिए उसे रंडी कहा गया.
दूसरी बार उसे रंडी तब बोला गया जब वह 14 साल की थी. उस समय वह लड़कियों की तरह रहना और लड़की होना सीख रही थी. वक्ष बहुत उभरे तो नहीं थे लेकिन इतने थे कि कपड़ो में उनका आकार दिखने लगा था. उस दिन वह पहली बार स्कूल में टाइट कपड़े पहनकर गयी थी. उसकी चाल ढाल बिल्कुल वही थी जिसे अब छोड़ने और बदलने की सीख दी जाने लगी थी. बड़ी क्लास के लड़कों को यह ठीक नहीं लगा. उनमें से किसी एक की दबी जुबान उस दिन खुल गयी - ' रंडी है साली ' .
तीसरी बार उसे रंडी तब बोला गया जब वह 18 साल की थी. मुहल्ले के कुछ लड़कों ने उसे मुहल्ले के बाहर के दो दोस्तों के साथ बात करते हुए देख लिया था. उनकी नज़रों में ऐसी हिकारत थी कि वह भीतर तक सहम गयी थी. ' रंडी निकल गयी है ये. एक नहीं दो के साथ लगी पड़ी है. अपने मुहल्ले का नाम खराब कर दिया साली ने. ' उस दिन रंडी शब्द उसके कानों में देर तक गूंजता रहा.
चौथी बार उसे रंडी तब बोला गया जब वह घर से लड़ झगड़ कर पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए यूनिवर्सिटी में दाखिले की जिद करने लगी. उस समय वह 23 की थी. उस दिन उसने ऐसी जिद पकड़ी कि वह घर के बाहर ही धरने पर बैठ गयी. पूरा मोहल्ला इकठ्ठा हो गया. उसकी जिद जायज थी. इंट्रेस इक्जाम में उसे सातवीं रैंक मिली थी. उसने बड़ी मुश्किल से चोरी छिपे एंट्रेंस इक्जाम दिया था.
उसकी जिद थी कि वह पढ़ेगी. उसे अभी शादी नहीं करनी. अगर किसी ने दबाव बनाया तो वह घर की चौखट पर ही जान दे देगी. मुहल्ले के शिक्षित बुजुर्गों के हस्तक्षेप के बाद घरवालों को झुकना पड़ा. लेकिन सभी बुजुर्ग ऐसे नहीं थे. उस दिन कईयों में आपसी खुसुरफुसुर हुई जो न चाहते हुए भी उसके कानों तक पहुंच गई - ' रंडी है फलाने की लड़की. जाने कितनों लड़को से मिलती है. कई बार तो मैंने सामने से जाकर देख लिया है. लेकिन मजाल की वहां से हटे. लाज शर्म कुछ है ही नहीं. उल्टा मुझे ही घूर के देखती है. इसको बाहर इसलिए जाना है ताकि वहां खुलकर मुंह काला कर सके. '
पांचवी बार उसे रंडी तब बोला गया जब वह अपने प्रेमी के साथ शहर में घूमते हुए देखी गयी. उम्र थी 25. वह बेधड़क अपने प्रेमी का हाथ अपने हाथों में लिए घूमती थी.
उस दिन बाइक से गुजरते हुए एक लड़के ने चीखकर कहा था - ' एक बार हमें भी छूने दे रंडी. हम क्या इससे बुरे हैं. '
छठी बार उसे रंडी तब बोला गया जब वह डिप्टी एसपी पद के लिए चयनित हुई. उम्र थी 27 साल. पार्टी के लिए वह दोस्तो के साथ रेस्टोरेंट गयी थी. वहां उसे फिर वही शब्द सुनने को मिला. 'अरे देख. ये रंडिया तो अधिकारी बन गयी. गज़ब भौकाल है साली का. हमी स्साला चुतिया बैठे हैं '
पिछले पांच बार उस लड़की ने रंडी शब्द सुनने के बाद क्या किया , उसने नहीं बताया था. लेकिन इस बार क्या हुआ , वो सब कुछ उसने बेहद गर्व के साथ बताया.
वह अपनी सीट से उठी और लड़के का कॉलर पकड़ के चार तमाचे जड़ दिए. उसने लड़के को ऐसा धक्का दिया कि वह अपनी सीट समेत ज़मीन पर लुढ़क गया. लड़के के दोस्त उसका आक्रामक रवैया देखकर चंपत हो गए. उस दिन लड़की ने उस लड़के को बहुत देर तक गालियां दी. उस पर लात घूंसे बरसाती रही. शायद 27 साल की उम्र तक उसने जो भी सहा था सब उस दिन ही फूट पड़ा. आखिर में पुलिस के आने के बाद ही लड़की ने उस लड़के को छोड़ा.
उस दिन उसे गुस्से के साथ पछतावा और गर्व भी था. मैंने पहली बार किसी इंसान में एक साथ इतनी भावनाएं देखी थी. उसमें 27 साल की उम्र तक जो भी झेला गया था , सबका गुस्सा भरा हुआ था. उसे यह पछतावा भी था कि वह 27 साल की उम्र में पहली बार रंडी कहने पर किसी का विरोध कर पाई. इतना समय लग गया उसे. उसे इस बात का गर्व भी था कि पहली बार उसने विरोध किया. ऐसा विरोध कि आसपास सब दंग रह गए.
उस दिन के बाद उसे किसी बेहद सामान्य या किसी बड़ी बात के चलते कितनी बार रंडी बोला गया उसे याद नहीं था. उसने रंडी बोले जाने की वजह से कितनों की खबर ली ये भी उसे याद नहीं था.
अब जब वो अपनी बीती जिंदगी कि ये सारी बातें बताती है तो उसे रंडी गाली नहीं बल्कि प्रेरणा लगती है. वह कहती है कि मैं नाहक ही गुस्सा हो जाया करती थी. रंडी कोई गाली नहीं है. रंडी मेरे लिए प्रेरणा है. मुझे जितनी बार रंडी बोला गया उतनी बार मेरा रंडी के प्रति सम्मान बढ़ता गया.
मैं आज जो भी हूँ वह महिलाओं के खिलाफ , समाज के तयशुदा मानकों को तोड़कर हूं. मैंने जब भी ऐसा कुछ किया मुझे रंडी कहा गया. मुझे आज कोई रंडी कहे तो गर्व होगा. मैं खुद को चरित्रवान और सभ्य-सुशील महिला की बजाय रंडी कहलवाना पसंद करूंगी. रंडी सिर्फ शब्द नहीं है. रंडी उस व्यवस्था से विद्रोह है जिससे निकलकर मैंने अपनी जिंदगी जीने के तौर तरीके खुद तय किये हैं.
Pradyumna Yadav
सोमवार, 21 मई 2018
अमेठी जिले में तिलोई के महान संत दूलनदास जिनके लिखे पदों में है ईश्वर पाने का सरलतम तरीका
गुरुवार, 17 मई 2018
घर बैठे किसी भी विभाग की किसी भी प्रकार की शिकायत कैसे कर सकते हैं
ऑनलाइन शिकायत पंजीकरण कैसे करें -
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इस नए पेज पर आपसे कुछ सहमति के बारे में पूछा जाएगा | जिस पर टिक मार्क लगाकर आप सबमिट करें | |
- पोर्टल पर अपनी शिकायत पंजीकरण कराने के लिए सबसे पहले आपको अपने मोबाइल/ लैपटॉप/ PC में Uttar Pradesh Jansunwai Portal की ऑफिशियल वेबसाइट jansunwai.up.nic.in पर जाना होगा | आप चाहें तो यहां क्लिक करके डायरेक्ट भी जा सकते हैं |
- ऑफिसियल वेबसाइट पर पहुंचने के पश्चात आपको यहां शिकायत पंजीकरण का लिंग दिखाई देगा | इस लिंक पर जैसे ही आप क्लिक करेंगे | आपके सामने एक नया पेज ओपन होगा |
रायबरेली दीवानी परिसर में कियोस्क मशीन का शुभारंभ
महिला उत्पीड़न की घटनाओं को सख्ती से रोकने के लिए 1090 हेल्पलाइन
वूमेन पावर लाइन-1090
वूमेन पावर लाइन 1090 सेवा को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए निमित्त वर्ष 2014 में “Women Security App 1090” सेवा भी प्रारम्भ की गयी है, जिसके अत्यन्त सकारात्मक परिणाम सामने आये है और इस सेवा से महिलाओ व लडकियों में सुरक्षा की भावना बलवती हुई है।
वूमेन पावर हेल्पलाइन नंबर 1090 की ताकत
- एक राज्य,एक नंबर 1090
- कोई भी पीड़ित महिला या उसकी महिला रिश्तेदार अपनी शिकायत इस नंबर पर नि:शुल्क दर्ज करवा सकती है।
- शिकायत करने वाली महिला की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाएगी।
- पीड़िता को किसी भी हालत में पुलिस थाने या किसी आफिस में नहीं बुलाया जाएगा।
- हेल्पलाइन में हर हाल में महिला पुलिस अधिकारी ही पीड़िता की शिकायत दर्ज करेगी।
- महिला पुलिस कर्मी अपने वरिष्ठ पुरूष पुलिस कर्मियों को पीड़ित की केवल उतनी ही जानकारी या सूचना उपलब्ध करवाएगी, जो विवेचना में सहायक हो सके।
- कॉल सेंटर दर्ज शिकायत पर तब तक काम करता रहेगा जब तक उस पर पूरी कार्रवाई नहीं हो जाती।
शुक्रवार, 11 मई 2018
जानिए क्या है वायरल सच: क्या किसी हाईकोर्ट ने गर्मी की छुट्टी में स्कूल फीस पर पाबंदी का फैसला सुनाया है?
अचानक बच्चों की स्कूल फीस को लेकर एक मैसेज वॉट्सऐप पर वायरल हो रहा है. मैसेज में गर्मी की छुट्टियों में स्कूल की फीस पर हाईकोर्ट के पाबंदी लगाने का दावा किया जा रहा है. ये मैसेज देखकर वो माता-पिता ज्यादा परेशान हैं जो जुलाई तक की फीस जमा कर चुके हैं और सोच रहे हैं कि अगर वाकई ऐसा हुआ है तो क्या उन्हें जमा किए पैसे वापस मिलेंगे?
मैसेज में हाइकोर्ट का ऑर्डर एक पिटीशन नंबर के साथ लिखा हुआ है. पिटीशन नंबर ‘5812 of 2015’ है. पिटीशन नंबर 5812 को जब इंटरनेट पर सर्च किया गया तो पता चला कि ये फैसला पाकिस्तान के सिंध हाईकोर्ट का है. इसी फैसले में सबसे ऊपर याचिकाकर्ता के वकील कमाल अफजर का नाम लिखा हुआ था.
सोमवार, 7 मई 2018
अगर आपको लगता है कि आप ही सब कर रहे तो जरूर पढ़ें
कौन चलाता है
तुम माँ के पेट में थे नौ महीने तक, कोई दुकान तो चलाते नहीं थे,
फिर भी जिए।
हाथ—पैर भी न थे कि भोजन कर लो,
फिर भी जिए।
श्वास लेने का भी
उपाय न था,
फिर भी जिए।
नौ महीने माँ के पेट में तुम थे,
कैसे जिए?
तुम्हारी मर्जी क्या थी?
किसकी मर्जी से जिए?
फिर माँ के गर्भ से जन्म हुआ, जन्मते ही, जन्म के पहले ही माँ के स्तनों में दूध भर आया,
किसकी मर्जी से?
अभी दूध को पीनेवाला
आने ही वाला है कि
दूध तैयार है,
किसकी मर्जी से?
गर्भ से बाहर होते ही
तुमने कभी इसके पहले
साँस नहीं ली थी माँ के पेट में
तो माँ की साँस से ही
काम चलता था—
लेकिन जैसे ही तुम्हें
माँ से बाहर होने का
अवसर आया,
तत्क्षण तुमने साँस ली,
किसने सिखाया?
पहले कभी साँस ली नहीं थी,
किसी पाठशाला में गए नहीं थे,
किसने सिखाया कैसे साँस लो?
किसकी मर्जी से?
फिर कौन पचाता है तुम्हारे दूध को
जो तुम पीते हो,
और तुम्हारे भोजन को?
कौन उसे हड्डी—मांस—मज्जा में बदलता है?
किसने तुम्हें जीवन की
सारी प्रक्रियाएँ दी हैं?
कौन जब तुम थक जाते हो
तुम्हें सुला देता है?
और कौन जब तुम्हारी
नींद पूरी हो जाती है
तुम्हें उठा देता है?
कौन चलाता है इन चाँद—सूर्यों को?
कौन इन वृक्षों को हरा रखता है?
कौन खिलाता है फूल
अनंत—अनंत रंगों के
और गंधों के?
इतने विराट का आयोजन
जिस स्रोत से चल रहा है,
एक तुम्हारी छोटी—सी जिंदगी
उसके सहारे न चल सकेगी?
थोड़ा सोचो,
थोड़ा ध्यान करो।
अगर इस विराट के आयोजन को
तुम चलते हुए देख रहे हो,
कहीं तो कोई व्यवधान नहीं है,
सब सुंदर चल रहा है,
सुंदरतम चल रहा है;
सब बेझिझक चल रहा है।
तुम छोटे से अंश हो इस जगत के,
तुम्हें यह भ्रांति कब से आ गयी कि
मुझे स्वयं को अलग से चलाना पड़ेगा?
मुझे अपना जिम्मा
अपने ऊपर लेना पड़ेगा?
इसी भ्रांति में तुमने
अपने जीवन के सारे कष्ट,
असफलताएँ और
विषाद पैदा कर लिए हैं।
आजादी के पहले से लेकर अब तक नही बदले रायबरेली के किसानो के हालात
आजादी के पहले रायबरेली के किसानो को अग्रेंजो ने और यहाँ के तालुकेदारों ने जम कर लूटा और उन पर जुर्म किये उनसे अनेक प्रकार के टैक्स और लगान वसूला जाता रहा है जो की अंग्रेज अपने शासन के खर्चो और तालुकेदार अपनी विलासिला पर खर्च करते थे इन सब जुर्मो से रायबरेली का किसान परेशान होकर अंगेजी शासन के खिलाफ़ उग्र हो गये और आजादी की लड़ाई में बड़ा आन्दोलन खड़ा कर चुके थे जिसमे रायबरेली के समीप सई नदी के तट पर हुए किसान गोली कांड को जलियांवाला बाग हत्या कांड के बाद आजादी की लड़ाई के इतिहास का दूसरा सबसे बड़ा हत्याकांड माना जाता है रायबरेली के इस आन्दोलन के बारे में रायबरेली जिले के साहित्यकार अमर बहादुर सिंह अमरेश ने अपनी लेखनी से इस का वर्णन इस प्रकार किया है उन्होंने लिखा रायबरेली के किसानों की भावनाओं का परिचय कुछ तथाकथित किसान नेताओं को मिल चुका था। वे इसे संगठनात्मक रूप देने के लिए आगे बढ़े। ‘अवध किसान सभा’ नामक एक संस्था की भी स्थापना की। इस किसान सभा की नियमावली बनायी गई थी। अवध के किसान-आंदोलन के साथ भारतीय इतिहासकारों ने न्याय नहीं किया है। यदि पं. जवाहरलाल नेहरू इसका उल्लेख ‘मेरी कहानी’ में न करते, तो आज इस आंदोलन का कोई नाम भी न लेता। सन १८५७ के प्रथम स्वाधीनता-संग्राम में अवध के किसानों ने खुलकर फिरंगी सेना का सामना किया था। बाद में सरकार और किसानों के मध्य तालुकेदारों की कड़ी थी। दोनों मिलकर किसानों को दबाने लगे। तालुकेदारों की नीति का पालन उनके अहलकार-मैनेजर, मुख्तार, जिलेदार तथा सिपाही करते थे। वे लगान वसूल करते थे। तालुकेदार अपनी विलासिता तथा उपभोग की वस्तुएँ खरीदने के लिए भी चंदा लगाया करते थे। जैसे हाथी खरीदने के लिए- ‘हाथीवान टैक्स लगता था।
यह थी, अवध और रायबरेली जिले कि किसानों की दुर्दशा। जिले के वयोवृद्ध कांग्रेसी नेता मुंशी सत्यनारायण श्रीवास्तव ने लिखा है- ‘‘बेदखली की तलवार यहाँ के किसानों की गर्दन पर हर वक्त लटकती रहती थी। अवध का किसान तालुकेदारों के जुल्मों से आजिज आ गया था। रायबरेली जिले में जगह-जगह किसानों ने तालुकेदारों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था। बदमाशों को मौका मिला और किसानों को गुमराह कराकर फुरसतगंज, करहिया बाजार आदि स्थानों पर लूट करा दी।’’
सन १९२०-२१ के ऐतिहासिक किसान-आंदोलन का उल्लेख करते हुए पं. अंजनीकुमार ने लिखा है- ‘‘इस आंदोलन का आरंभ क्यों और कैसे हुआ, इसको बताने के लिए यह आवश्यक है कि पहले यह बता दिया जाए कि सन १९२० व उसके पहले यहाँ के किसानों की स्थिति व दशा कैसी थी। तालुकेदारी प्रथा थी। तालुकेदार अपने को राजा कहते थे।’’
आजादी के 70 साल बीत जाने के बाद भी नही बदले है किसानो के हालात पहले अंग्रेज और तालुकेदार की जगह पर व्यपारी और सरकारी अधिकारियो ने ले ली है जिस तरह सेअंग्रेजो के जुल्मो से तब का किसान परेशान था वर्तमान में अधिकारियों की स्वेच्छाचारिता की वजह से किसान परेशान है
किसानो के लिए बनाई गयी मंडियों में आज निम्न परेशानिया है जिससे किसान रोज रु बरु होता है
1. व्यापारियों द्वारा किसानों से गेहूं खरीदते समय एमएसपी से ₹200 कम भुगतान किया जा रहा है।
2. किसानों को प्रपत्र 6R न देकर कच्चा पर्चा दिया जा रहा है, जिससे राजस्व की चोरी भी हो रही है।
3. किसानों से गेहूं क्रय करते समय 200 ग्राम की बोरी का वजन 500 ग्राम तथा 700 ग्राम की बोरी का वजन 1500 ग्राम के हिसाब से तय करके कटौती की जा रही है।
4. इसी तरह किसानों से पल्लेदारी की तय राशि से दोगुना भुगतान लिया जा रहा है।
5. सरकारी क्रय केंद्रों पर गेहूँ की बिक्री करने के लिए किसानों को 15 दिन बाद तक का समय दिया जा रहा है।
6. सरकारी क्रय केंद्रों पर दैनिक क्षमता से 3 से 4 गुना अधिक खरीददारी दिखाई जा रही है, केंद्र के अधिकारियों तथा बिचौलियों की मिलीभगत साफ जाहिर होती है।
7. मंडी के नीलामी चबूतरों पर व्यापारियों का अनधिकृत कब्जा है, जिस कारण किसान अपने उत्पाद खुले में रखने के लिए बाध्य हैं।
पिछले महीने की 24 तारीख को इसी मंडी में व्याप्त भरस्टाचार को लेकर जय किसान आंदोलन उत्तर प्रदेश के संयोजक संजय कुमार के द्वारा MSP सत्याग्रह किया गया था जिसमे देश भर में किसानों का आंदोलन चला रहे प्रो योगेंद्र यादव भी शामिल हुए । जिसमें किसानों के लिए बने विश्राम गृह पर मंडी समिति के अध्यक्ष द्वारा दसको से जमाये कब्जे को खाली कराने की मांग प्रमुखता से की गई थी ।
तिरगें को नमन
झूमे धरती झूमे अंबर झूमता है दिग - दिगंत भूली बिसरी यादें लेके आया है 15 अगस्त करू तिरंगे को नमन सर झुका कर आंख नम ऐ शहीदों आप क...

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'श्रीरामचरितमानस' के अद्भुत टीकाकार थे शाहमऊ विकास खण्ड तिलोई जनपद अमेठी के महाराज कुमार बाबू रणबहादुर सिंह भारतीय राजवं...
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मलिक मुहम्मद जायसी (१४७७-१५४२) हिन्दी साहित्य के भक्ति काल की निर्गुण प्रेमाश्रयी धारा के कवि हैं। वे अत्यंत उच्चकोटि के सरल और उदार ...
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पहली बार उसे रंडी तब बोला गया जब वह करीब 8 साल की थी. घर में किसी ने गाली दी थी. शायद बड़ी या छोटी दादी में से कोई थी. घर का माहौल ऐसा था कि ...